भारत की वैज्ञानिक क्रांति: CSIR-IMTECH ने विकसित की नई एंटीबायोटिक “नेफिथ्रोमायसिन”, जो कैंसर संक्रमणों पर करेगी वार
भारत ने चिकित्सा विज्ञान में रचा नया इतिहास — CSIR-IMTECH के वैज्ञानिकों ने 14 वर्षों के शोध के बाद “नेफिथ्रोमायसिन” नामक नई एंटीबायोटिक विकसित की है, जो कैंसर रोगियों में संक्रमण से लड़ने में प्रभावी है। यह खोज भारत की वैज्ञानिक आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही है।
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भारत की ऐतिहासिक वैज्ञानिक उपलब्धि: कैंसर से होने वाले संक्रमणों पर कारगर नई एंटीबायोटिक नेफिथ्रोमायसिन— आत्मनिर्भर विज्ञान की नई दिशा
परिचय :
भारत की वैज्ञानिक दुनिया ने एक बार फिर इतिहास रच दिया है। लंबे अनुसंधान, अथक परिश्रम और निरंतर वैज्ञानिक प्रयोगों के बाद भारतीय वैज्ञानिकों ने एक ऐसी नई एंटीबायोटिक विकसित की है जो कैंसर रोगियों में होने वाले संक्रमणों पर प्रभावी ढंग से काम करती है। इस दवा का नाम है — ‘नेफिथ्रोमायसिन’ (Nafithromycin)। इसे वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) और इंस्टीट्यूट ऑफ माइक्रोबियल टेक्नोलॉजी (IMTECH), चंडीगढ़ के वैज्ञानिकों ने लगभग 14 वर्षों के दीर्घ अनुसंधान के बाद तैयार किया है।
केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने इस खोज की घोषणा करते हुए कहा कि यह भारत की वैज्ञानिक आत्मनिर्भरता (Scientific Self-Reliance) की दिशा में एक “मील का पत्थर” (Milestone) साबित होगी।
नेफिथ्रोमायसिन सिर्फ एक नई दवा नहीं है, बल्कि यह उस जटिल समस्या के समाधान की कुंजी है जिसे पूरी दुनिया आज एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) के नाम से जानती है। जब पारंपरिक एंटीबायोटिक दवाएं संक्रमणों पर असर करना बंद कर देती हैं, तब यह नई दवा एक उम्मीद की किरण बनकर सामने आई है।
कैंसर और संक्रमण: एक दोहरी चुनौती क्यों?
कैंसर स्वयं एक जटिल और लंबा चलने वाला रोग है, लेकिन इसका उपचार — विशेष रूप से कीमोथेरेपी (Chemotherapy) या रेडिएशन थेरेपी (Radiation Therapy) — मरीज की रोग-प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) को बहुत कम कर देता है। जब इम्यूनिटी कमजोर पड़ती है, तो शरीर सामान्य जीवाणुओं (Bacteria) या फफूंद (Fungi) के प्रति भी संवेदनशील हो जाता है। यही वह अवस्था होती है जब कई ड्रग-रेज़िस्टेंट संक्रमण (Drug-resistant infections) मरीज के जीवन के लिए खतरा बन जाते हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, कैंसर रोगियों में होने वाली कुल मृत्यु का लगभग 20–25% हिस्सा संक्रमणों से जुड़ा होता है। इनमें से अधिकतर संक्रमण उन बैक्टीरिया से होते हैं जो पहले की एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति प्रतिरोधक बन चुके हैं — जैसे Pseudomonas aeruginosa, Klebsiella pneumoniae, या Staphylococcus aureus। यही वह समस्या थी जिसके समाधान के लिए भारतीय वैज्ञानिकों ने नोफ्थियोमाइसिन पर शोध की शुरुआत की।
नोफ्थियोमाइसिन: क्या है यह नई एंटीबायोटिक और कैसे करती है काम?
नेफिथ्रोमायसिन (Nafithromycin ) एक नया जैविक यौगिक (Novel Bioactive Compound) है जिसे मिट्टी में पाए जाने वाले एक दुर्लभ सूक्ष्मजीव (rare microbial strain) से खोजा गया है। इस यौगिक का रासायनिक ढांचा (chemical structure) पारंपरिक एंटीबायोटिक वर्गों से भिन्न है, जिससे यह उन रोगजनक बैक्टीरिया पर भी असर डालती है जो पुराने उपचारों के प्रति प्रतिरोधक बन चुके हैं।
कार्य करने की प्रक्रिया (Mechanism of Action):
नेफिथ्रोमायसिन बैक्टीरिया की सेल वॉल सिंथेसिस (Cell wall synthesis) को रोकती है और साथ ही बैक्टीरिया की डीएनए मरम्मत प्रणाली को बाधित करती है। इस दोहरे प्रभाव (dual action mechanism) के कारण बैक्टीरिया के पास जीवित रहने का कोई विकल्प नहीं बचता और वे स्वतः नष्ट हो जाते हैं।
वैज्ञानिकों ने बताया कि यह दवा Gram-positive और Gram-negative दोनों प्रकार के रोगजनकों पर प्रभावी पाई गई है — जो इसे अत्यधिक बहुउपयोगी (broad-spectrum) बनाती है।
14 वर्षों का अनुसंधान: प्रयोगशाला से खोज तक की यात्रा
इस खोज की शुरुआत 2010 के दशक की शुरुआत में हुई जब CSIR-IMTECH की टीम ने कुछ ऐसे सूक्ष्मजीवों का अध्ययन प्रारंभ किया जो सामान्य एंटीबायोटिक स्ट्रेन्स से अलग व्यवहार कर रहे थे।
लगातार परीक्षणों, जीनोमिक विश्लेषण (genomic analysis), और रासायनिक संश्लेषण (chemical synthesis) के बाद, वैज्ञानिकों ने पाया कि एक विशेष स्ट्रेन नेफिथ्रोमायसिन नामक यौगिक उत्पन्न करता है जो कई घातक रोगजनकों के विकास को रोक सकता है।
14 वर्षों की इस यात्रा में भारतीय वैज्ञानिकों ने 10,000 से अधिक सैंपल्स का अध्ययन किया और 97 प्रमुख रोगजनकों पर परीक्षण किए, जिनमें 60% से अधिक पर यह दवा बेहद प्रभावी साबित हुई।
केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने इस सफलता को “भारत की वैज्ञानिक प्रतिबद्धता का परिणाम” बताते हुए कहा —
“यह शोध दर्शाता है कि भारत अब नई एंटीबायोटिक्स के विकास में भी अग्रणी भूमिका निभाने के लिए तैयार है। नोफ्थियोमाइसिन भविष्य की उन दवाओं में से एक है जो न केवल संक्रमणों को रोकेंगी बल्कि स्वास्थ्य क्षेत्र में आत्मनिर्भर भारत के विज़न को भी साकार करेंगी।”
वैश्विक संदर्भ: एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) की बढ़ती चिंता
विश्व स्तर पर एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) आज एक वैश्विक स्वास्थ्य आपातकाल (Global Health Emergency) के रूप में देखा जा रहा है। WHO की एक 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, यदि नई एंटीबायोटिक दवाएं विकसित नहीं की गईं, तो 2050 तक AMR से हर वर्ष 1 करोड़ (10 million) लोगों की मृत्यु हो सकती है।
भारत में भी स्थिति गंभीर है —
अनुमान है कि हर साल लगभग 7 लाख से अधिक संक्रमणजन्य मौतें AMR के कारण होती हैं।
कई प्रमुख अस्पतालों में 40% से अधिक संक्रमण “ड्रग-रेज़िस्टेंट” पाए जाते हैं।
इस पृष्ठभूमि में नोफ्थियोमाइसिन जैसी नई दवा न केवल वैज्ञानिक रूप से बल्कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति (National Health Policy) के दृष्टिकोण से भी बेहद अहम है।
क्लिनिकल ट्रायल्स और सुरक्षा मूल्यांकन (Clinical Trials & Safety Evaluation)
नोफ्थियोमाइसिन पर प्रारंभिक प्री-क्लिनिकल स्टडीज़ पूरी हो चुकी हैं, जिनमें इसे चूहों और अन्य मॉडल ऑर्गेनिज़्म्स पर परखा गया।
इन परीक्षणों में कोई प्रमुख विषाक्त प्रभाव (toxicity) नहीं पाया गया। अब दवा मानव क्लिनिकल ट्रायल्स (Human Clinical Trials) के प्रथम चरण में प्रवेश कर रही है, जिसमें कैंसर रोगियों के संक्रमणों पर इसके प्रभाव और सुरक्षा का मूल्यांकन किया जाएगा।
वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि सब कुछ सुचारू रूप से चलता रहा, तो आने वाले 3–5 वर्षों में यह दवा व्यावसायिक उपयोग (commercial launch) के लिए तैयार हो सकती है।
विशेषज्ञों की राय (Expert Opinions)
डॉ. आर. के. आनंद, वरिष्ठ माइक्रोबायोलॉजिस्ट, ने कहा —
“नोफ्थियोमाइसिन केवल एक दवा नहीं, बल्कि यह वैश्विक एंटीबायोटिक संकट से निपटने का भारतीय उत्तर है। भारत जैसे देश, जहाँ संक्रमण रोग अभी भी स्वास्थ्य भार का बड़ा हिस्सा हैं, वहाँ यह खोज क्रांतिकारी प्रभाव डाल सकती है।”
डॉ. मीनाक्षी गुप्ता, ऑन्कोलॉजिस्ट, ने टिप्पणी की —
“कैंसर मरीजों के लिए संक्रमण अक्सर जानलेवा साबित होते हैं। नोफ्थियोमाइसिन जैसी दवा ऐसे मरीजों की जीवन प्रत्याशा (life expectancy) में उल्लेखनीय सुधार ला सकती है।”
भारत की वैज्ञानिक आत्मनिर्भरता और भविष्य की दिशा
नोफ्थियोमाइसिन की खोज को “भारत की एंटीबायोटिक क्रांति” कहा जा सकता है। यह केवल एक औषधीय उपलब्धि नहीं, बल्कि ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के वैज्ञानिक स्वरूप का प्रतीक है।
इस उपलब्धि से यह स्पष्ट होता है कि भारत अब सिर्फ दवा निर्माण (drug manufacturing) में ही नहीं, बल्कि दवा खोज (drug discovery) में भी अग्रणी बनने की क्षमता रखता है।
यह दवा भविष्य में न केवल भारत में बल्कि वैश्विक बाज़ार में भी भारत की वैज्ञानिक प्रतिष्ठा को नई ऊँचाइयों पर ले जाएगी।
निष्कर्ष:
नेफिथ्रोमायसिन की खोज भारतीय चिकित्सा विज्ञान की एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। यह दवा न केवल कैंसर से जुड़े संक्रमणों से जूझ रहे लाखों मरीजों के लिए उम्मीद की नई किरण है, बल्कि यह भारत के वैज्ञानिक समुदाय की प्रतिभा, लगन और आत्मनिर्भरता का जीवंत उदाहरण भी है।
स्रोत :
CSIR-IMTECH, Chandigarh — Research Report (2025)
Ministry of Science & Technology Press Release, Government of India
WHO Antimicrobial Resistance Report (2024)
The Hindu / Hindustan Times Coverage (October 2025)
Expert Interviews: Dr. R.K. Anand (Microbiology), Dr. Meenakshi Gupta (Oncology)
Disclaimer
यह लेख केवल सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए है। इसमें दी गई जानकारी किसी भी प्रकार की चिकित्सीय सलाह (Medical Advice) नहीं है। किसी भी चिकित्सा निर्णय के लिए हमेशा अपने डॉक्टर या स्वास्थ्य विशेषज्ञ से परामर्श करें।
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